पानीपत की लड़ाई : जानिए तीनो युद्ध की सच्चाई
- Oct 1, 2021
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पानीपत की लड़ाई के लिए बाबर को आलम खान और दौलत खान के रूप में जाना जाता है। युद्ध में जाने से पहले बाबर ने 4 बार मौलिक शोध किया था। इस बीच कुछ नाराज अफगान लोगों ने अफगानिस्तान में हमला करने के लिए बाबर को बुला लिया। मेवाड़ के राजा राणा संग्राम सिंह ने भी बाबर को इब्राहिम लोधी के विरोध में खड़े होने के लिए कहा, क्योंकि राणा जी का अब्राहम के साथ पुराना विवाद था। इन सबके कारण बाबर ने इब्राहिम लोधी को पानीपत में युद्ध करने की चुनौती दी। अप्रैल 1526 में, बाबर को पानीपत का संघर्ष प्राप्त हुआ, खुद को पराजित देखकर, इब्राहिम लोदी ने इस युद्ध में खुद को मार डाला। सभी की धारणा थी कि इस संघर्ष के बाद बाबर भारत छोड़ देगा, लेकिन हुआ इसके विपरीत। बाबर ने भारत में ही अपना साम्राज्य फैलाने का निश्चय किया। बाबर की जीत को भारत के रिकॉर्ड में पानीपत की पहली जीत कहा जाता है, इसे दिल्ली की जीत भी माना जाता है। इस जीत ने भारतीय राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया, साथ ही मुगलों के लिए भी बड़ी जीत साबित हुई।
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किसके बीच पानीपत के 3 युद्ध हुए: पहला इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच, दूसरा अकबर और सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बीच और तीसरा अहमद शाह अब्दाली और पुणे के सदाशिवराव भाऊ पेशवा के बीच।
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1. पानीपत की पहली लड़ाई:
पानीपत का पहला संघर्ष 21 अप्रैल 1526 को दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच हुआ। इस संघर्ष में इब्राहिम लोदी और उसके १५,००० पैदल सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध ने भारत में बहलुल लोदी की सहायता से और दिल्ली और आगरा में बाबर के हस्तक्षेप के आधार पर लोदी वंश को समाप्त कर दिया।
2. पानीपत का दूसरा युद्ध:
पानीपत का दूसरा युद्ध अकबर और सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बीच पांच नवंबर 1556 को हुआ था। इस युद्ध में हेमचंद्र ने पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी और वह जीत की ओर अग्रसर हो गया, लेकिन युद्ध में एक अवसर ऐसा भी आया है जब मुगल सेना ने हेमचंद्र उर्फ हेमू के ध्यान में एक तीर मारा और वह बेहोश हो गया, इस घटना को युद्ध मिला। . यह दृश्य देखकर हेमू की सेना भाग गई, जिसके कारण अकबर या बैरम खान (अकबर के लोकप्रिय) ने हेमचंद्र का सिर काट दिया। इसके बाद अकबर ने दिल्ली और आगरा पर कब्जा कर लिया।
3 । पानीपत की तीसरी लड़ाई:
पानीपत की तीसरी लड़ाई 1761 में अफगान आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली और पुणे के सदाशिवराव भाऊ पेशवा के बीच लड़ी गई। सदाशिवराव भाऊ को इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था। यह हार रिकॉर्ड में मराठों की सबसे बुरी हार में बदल गई।
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