हुमायूँ : जिसने मुग़ल साम्राज्य के लिए लड़े कई युद्ध
- Oct 4, 2021
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हुमायूँ एक भयानक मुगल शासक में बदल गया। पहला मुगल बादशाह बाबर के बेटे नसीरुद्दीन हुमायूँ (6 मार्च 1508 - 22 फरवरी 1556) में बदल गया। हालाँकि अब उसके पास दशकों तक साम्राज्य नहीं रहा, फिर भी हुमायूँ का योगदान मुगल साम्राज्य के आधार पर है। बाबर की मृत्यु के बाद, हुमायूँ ने 1530 में भारत की गद्दी संभाली और उसके सौतेले भाई कामरान मिर्जा ने काबुल और लाहौर का शासन संभाला। अपनी मृत्यु से पहले भी बाबर ने राज्य को इस प्रकार विभाजित किया कि बाद में दोनों भाइयों के बीच कोई लड़ाई न हो। कामरान बाद में हुमायूँ के कड़े विरोधी बन गए। हुमायूँ का शासन 1530-1540 और फिर 1555-1556 तक अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के तत्वों पर चला।
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हुमायूँ का जीवन :
26 दिसंबर 1530 ई. को बाबर की मृत्यु के बाद, हुमायूं 23 वर्ष की आयु में 30 दिसंबर 1530 ई. को राज्याभिषेक हुआ। बाबर ने अपने जीवन की हानि से पहले हुमायूँ को सिंहासन का उत्तराधिकारी घोषित किया था। हुमायूँ को उत्तराधिकार देने के साथ-साथ बाबर ने विशाल साम्राज्य को अपने भाइयों में बाँटने के लिए भी कहा था, इसलिए उसने संभल को अस्करी, मेवात को हिन्दाल और पंजाब को कामरान को दे दिया।
१५५६ में उनकी मृत्यु के समय, मुगल साम्राज्य लगभग दस लाख किलोमीटर तक फैला था। बाद में हुमायूँ ने शेर शाह सूरी को हराकर पश्तूनों को भी अपना अधिकार खो दिया लेकिन बाद में फारसियों की सहायता से उसने इसे वापस पा लिया। हुमायूँ ने अपने शासनकाल के किसी बिंदु पर मुगल दरबार के अंदर कुछ महत्वपूर्ण संशोधन भी किए।
प्रसिद्ध इतिहासकार रसब्रुक विलियम्स के अनुसार- “मुगल शासक बाबर ने अपने पुत्र के लिए एक ऐसा साम्राज्य छोड़ा जो युद्ध की परिस्थितियों में सरलता से तैयार किया जा सकता था और शांति के समय में कमजोर, संरचनाहीन और निराधार था। बाबर का वजीर मीर निजामुद्दीन खलीफा मुगल साम्राज्य की मेंहदी ख्वाजा (बाबर की बड़ी बहन के पति) को सौंपना चाहता था, लेकिन बाद में वजीर ने हुमायूँ से प्रबंधन चलाने का अनुरोध किया।
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डौहरिया की लड़ाई:
हुमायूँ की नौसेना जौनपुर की ओर बढ़ती हुई और महमूद लोदी की सेना अगस्त 1532 में डौहरिया नामक क्षेत्र में लड़ी, जिसमें महमूद हार गया। इस संघर्ष में अफगान सेना महमूद लोदी के नेतृत्व में बदल गई।
कन्नौज की लड़ाई:
कन्नौज की लड़ाई में 1540 ई. में मुगल और अफगान सेना फिर से अलग-अलग के सामने आ गई। इस संघर्ष में हुमायूँ की सेना अफगान नौसेना के माध्यम से निर्णायक रूप से पराजित हो गई। हुमायूँ ने भारत छोड़ दिया और निष्कासन का जीवन व्यतीत किया। इस तरह उन्होंने अगले 15 साल तक निष्कासन का पूरा जीवन जिया। उसने ईरान (फारस) के शाह तहमासप-ए-ऐदाब के दरबार में शरण ली। वह अपने भाई अस्करी से कंधार को जीतने में पूरी तरह सक्षम हो गया। उसने 1547 ई. में कामरान से काबुल पर विजय प्राप्त की।
चौसा की लड़ाई:
चौसा की लड़ाई चौसा हुमायूं और शेर शाह के बीच लड़ी गई। इस लड़ाई में अफगान सेना के सामने मुगल नौसेना पूरी तरह से हार गई। एक तरह से हुमायूँ को भारत से निष्कासित कर दिया गया।
बहादुर शाह के साथ युद्ध:
गुजरात के शासक बहादुर शाह ने 1531 ईस्वी में मालवा के किले और 1532 ईस्वी में रायसिन पर कब्जा कर लिया। १५३४ ई. में उसने चित्तौड़ पर आक्रमण कर उसे एक सन्धि के लिए विवश कर दिया। बहादुर शाह ने तुर्की के तोपखाने रूमी खान की मदद से एक बेहतर तोपखाना बनवाया। दूसरी ओर शेर खान ने 'सूरजगढ़ के राज' में बंगाल को हराकर खूब वाहवाही बटोरी। उसकी बढ़ती हुई ऊर्जा हुमायूँ के लिए मुसीबत का सबब बन गई, लेकिन हुमायूँ की पहली मुसीबत बहादुर शाह में बदल गई। सन् 1535 ई. में 'सारंगपुर' में बहादुर शाह और हुमायूँ के बीच संघर्ष हुआ है। बहादुर शाह पराजित हो गया और मांडू भाग गया।
इस प्रकार, हुमायूँ द्वारा मांडू और चंपानेर की विजय के बाद, मालवा और गुजरात उसके हेरफेर के अधीन आ गए। इसके बाद बहादुर शाह ने चित्तौड़ को घेर लिया। चित्तौड़ के शासक विक्रमजीत की माता कर्णावती ने इस अवसर पर हुमायूँ को राखी भेजकर बहादुर शाह के विरुद्ध सहायता माँगी। हालाँकि, एक काफिर राष्ट्र की मदद न करने के लिए बहादुर शाह का अनुरोध हुमायूँ के माध्यम से सामान्य हो गया। एक साल बाद, बहादुर शाह ने पुर्तगालियों की मदद से 1536 ई. में फिर से गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया, लेकिन बहादुर शाह की मृत्यु फरवरी, 1537 ई. में हुई।
चौसा की लड़ाई:
26 जून 1539 को गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित 'चौसा' नामक स्थान पर हुमायूँ और शेर खान की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ है। हुमायूँ अपनी कुछ गलतियों के कारण यह संघर्ष हार गया। युद्ध के अंदर मुगल नौसेना को बहुत नुकसान हुआ। हुमायूँ एक भिश्ती की सहायता से संघर्ष क्षेत्र से भाग निकला और किसी तरह गंगा नदी को पार करके अपने अस्तित्व को बचाया। चौसा के युद्ध में अपना वजूद कायम रखने वाले बिष्टी हुमायूं ने उन्हें दोपहर के लिए दिल्ली का बादशाह बना दिया था। चौसा की लड़ाई में सफल होने के बाद, शेर खान ने खुद को 'शेर शाह' (राज्याभिषेक के समय) के नाम से पेश किया।
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